दिल्ली में सोमवार को 25 विपक्षी दलों के नेता INDI Alliance की मीटिंग में पहुंचे। तय ये हुआ कि अब तक जो हुआ, सो हुआ, अब बीजेपी के खिलाफ मिलकर लड़ेंगे। लेकिन क्या ये सारी पार्टियां एक गठबंधन में रह पायेंगी? ये बैठक ममता बनर्जी के आग्रह पर बुलाई गई थी। ममता को सहारे की ज़रूरत है, उनकी पार्टी इस वक्त बैसाखियों पर है। वो ज़माना चला गया, जब इंडी अलायंस में ममता बनर्जी का दबदबा था। उस समय उन्होंने विधानसभा चुनाव में BJP को हराया था। लोकसभा में भी उनके अच्छे खासे सांसद थे, लेकिन देखते ही देखते सब कुछ बदल गया।
INDI Alliance में अब कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी है, तीन राज्यों में उसकी सरकारें हैं पर Alliance तो राष्ट्रीय स्तर पर है और कांग्रेस तीन बार लोकसभा चुनाव हार चुकी है। हारे हुए क्षेत्रीय नेताओं में तेजस्वी यादव, शरद पवार, उद्धव ठाकरे, अखिलेश यादव हैं। पहले दो और दिग्गज थे, केजरीवाल और स्टालिन। सब के सब चुनाव हारने के बाद कांग्रेस से दूर होते गए। इंडी अलायंस बिखरने लगा।
राहुल गांधी कम से कम इस मामले में फायदे में हैं, चुनाव हार चुके नेता फिर से अलायंस बनाने के लिए विवश हैं। वक्त की मजबूरी है, पर दिल से कोई एक दूसरे को नहीं चाहता। इसे कहते हैं, रहा भी न जाए, सहा भी न जाए।
गद्दार कौन? वफादार कौन?
हैरानी की बात है कि ममता बनर्जी दिल्ली में थीं और उसी समय दिल्ली में उनकी पार्टी संसद में टूट गई। लेकिन ममता पार्टी में टूट पर एक शब्द नहीं बोलीं। तृणमूल कांग्रेस के 28 में से बीस सांसदों ने अपना रास्ता अलग कर लिया। काकोली घोष दस्तीदार के नेतृत्व में इन सांसदों ने लोकसभा स्पीकर को पत्र भेज कर कहा कि वे अब सदन में NDA का समर्थन करेंगे।
इस वक्त तृणमूल कांग्रेस तीन गुटों में बंटी नजर आ रही है। एक गुट है ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी का। दूसरा गुट है काकोली घोष दस्तीदार की अगुवाई वाले तृणमूल कांग्रेस के सांसदों का और तीसरा गुट है बंगाल विधानसभा में तृणमूल कांग्रेस के विधायकों के नेता ऋतब्रत बनर्जी का। सियासत में वक्त कैसे बदलता है, ये सोमवार को दिल्ली में दिखाई दिया। ममता बनर्जी जहां बैठकर, सोनिया और राहुल के साथ मिलकर मोदी से लड़ने का प्लान बना रही थीं, उससे थोड़ी ही दूर उनकी पार्टी के दो-तिहाई सांसद दीदी को छोड़कर मोदी का समर्थन करने की चिट्ठी ड्राफ्ट कर रहे थे।
ये सही है कि जाने वालों में काकोली घोष दस्तीदार जैसे सांसद हैं, जो जीवन भर तृणमूल कांग्रेस में रहे, इसलिए उनके पाला बदलने को गद्दारी कहा गया। पर गद्दार कहने वाले कौन हैं, ये देखना भी जरूरी है। कीर्ति आजाद जो जिंदगी भर BJP में रहे, कुछ ही साल पहले टिकट पाने के लिए दीदी की शरण में आए अब TMC छोड़ने वालों को गद्दार कह रहे हैं। (रजत शर्मा)
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